घर वही, जहाँ स्मृतियाँ बसी हों।
हमारे भारद्वाज परिवार में एक बात पीढ़ियों से चली आ रही है—जहाँ भी परिवार के सदस्य मिलते, वहाँ यादों का सिलसिला अपने आप शुरू हो जाता। वही पुराने किस्से, वही पुरानी बातें, वही घटनाएँ—पर हर बार उतनी ही ताज़ा, उतनी ही दिलचस्प, उतनी ही आत्मीय। कोई कहानी हमें हँसाती, कोई गर्व से भर देती, और कोई पल भर के लिए आँखें नम कर जाती।
हर बार ऐसा लगता जैसे इन्हें पहली बार सुन रहे हों।
इन्हीं अनगिनत स्मृतियों, कथाओं, परंपराओं और अनकहे अनुभवों को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाने का संकल्प है—“स्मृति दर्पण”। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक साझा विरासत है—हमारे बड़ों का जीवन, उनके संघर्ष, उनकी सीख, और हमारा सांस्कृतिक बीज-तत्व।
“स्मृति दर्पण” के माध्यम से कोशिश यही है कि हमारे बच्चे, और उनके भी बच्चे, अपनी जड़ों को पहचानें—जानें कि हम कहाँ से आए, किसने हमें आकार दिया, किन परिस्थितियों ने हमारे परिवार को गढ़ा, और किन परंपराओं ने हमारी पहचान को मज़बूती दी। यह सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि वह भावनात्मक धरोहर है जो हमें एक सूत्र में बाँधती है।
यह मुंहजबानी कहानियों के सिलसिले का अगला कदम है—ताकि ये कहानियाँ कभी खो न जाएँ, ताकि हर पीढ़ी इन्हें पढ़ सके, महसूस कर सके, और आगे बढ़ा सके। आज जो हम लिख रहे हैं, सँजो रहे हैं, वह आने वाले समय के लिए एक संकेत है—एक निमंत्रण कि इस विरासत को संभाले रखना, इसे आगे बढ़ाना और इसे जीवित रखना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
हम आशा करते हैं कि “स्मृति दर्पण” आपके हृदय को भी उतनी ही गहराई से छुएगा, जितना यह हमारे परिवार की स्मृतियों में जीवित है।
पुस्तक परिचय
यह पुस्तक “स्मृति दर्पण” केवल एक आत्मकथा नहीं, बल्कि विस्थापन, पुनर्स्थापन और पहचान की यात्रा है। विभाजन की पीड़ा, जड़ों से उखड़ने का दुख और नए देश में अपनेपन की खोज—यह सब स्वर्गीय श्री मदन लाल शर्मा जी ने अत्यंत आत्मीयता और सजीव अनुभवों के साथ पृष्ठ दर पृष्ठ बिखेरा है।
यह कहानी है उनके ऐसे परिवार की जो अविभाजित भारत के गुजरांवाला के ज़िले आसपास के एक गाँव से अपने जीवन की बुनियादें छोड़कर भारत आया। संघर्षों से भरी नई ज़िंदगी में मदन लाल शर्मा जी ने न केवल अपने परिवार को फिर से जोड़ा, बल्कि एक शिक्षक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान भी स्थापित की।
इस यात्रा में पंजाब की सांस्कृतिक परंपराएं, रीतिरिवाज़, लोकगीत, विवाह और व्रत जैसे पक्ष भी बड़ी खूबसूरती से दर्ज हैं, जिससे यह पुस्तक एक पीढ़ी का दस्तावेज़ बन जाती है। साथ ही यह एक समुदाय की गाथा भी है—विशेषकर सारस्वत ब्राह्मणों की, जिनकी धार्मिक और सामाजिक विरासत को लेखक ने आदर और गहराई से उकेरा है।
“स्मृति दर्पण” एक परिवार की गाथा है, पर इसमें पूरे समाज की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। यह पुस्तक हर उस पाठक के हृदय को छूएगी जिसने अपने जीवन में कभी घर, ज़मीन, भाषा या पहचान खोई हो—और फिर उन्हें फिर से गढ़ा हो। यह न केवल अतीत को स्मरण करने का एक अवसर है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सांस्कृतिक उत्तराधिकार भी है।